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Showing posts with the label सुभाषितम्

सुविचार

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।। अर्थ : "सङ्कुचित मानसिकता वाले व्यक्तियों के लिये अपने व पराये का भेद रहता है। परन्तु जो उदार वृत्ति रखते है, उनके लिये तो सम्पूर्ण वसुन्धरा ही अपने कुटुम्ब के समान है।"

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वाणी रसवती यस्य यस्य श्रमवती क्रिया । लक्ष्मी: दानवती यस्य सफलं तस्य जीवितम् ।। अर्थ : "जिस की वाणी मधुर है, जिसका कार्य परिश्रम से युक्त है, जिसका वित्त दान में प्रयुक्त होता है, उसका जीवन सफल है।"

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न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत् । यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संविभजन्ति तम् ।। अर्थ : "देव, किसी की, हाथ मे दंड लेकर रक्षा नहीं करते वरन् जिनका रक्षण करने की इच्छा करते हैं, उन्हें बुद्धि प्रदान करते हैं।"

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आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् । सर्व देव नमस्कार: केशवं प्रति गच्छति।। अर्थ : "जिस प्रकार आकाश से गिरा जल विविध नदीयों के माध्यम से अंतिमत: सागर से जा मिलता है, उसी प्रकार सभी देवताओं को किया हुवा नमन एक ही ईश्वर को प्राप्त होता है।" 

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नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य  क्रियते वने। विक्रमार्जितसत्त्वस्य स्वयमेव  मृगेन्द्रता॥ - महाकविमाघः अर्थ : "सिंह को अरण्य का राजा नियुक्त करने के लिए न तो कोई अभिषेक किया जाता है, न कोई संस्कार। अपने गुण और पराक्रम से वह स्वयं ही 'मृगेन्द्रपद' प्राप्त करता है।"

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एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन सुगन्धिना। वा सितं तद्वन सर्व सुपुत्रेण कुलं यथा ॥  अर्थ : "सुगन्धित पुष्प के एक ही अच्छे वृक्ष के कारण सम्पूर्ण वन प्रभावित होता है, उसी प्रकार एक सुपुत्र के कारण पूर्ण परिवार का नाम रोशन होता है।"

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एकेन शुष्क वृक्षेण दह्यमानेन वह्मिना । दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं यथा ॥ अर्थ : "एक सूखे वृक्ष के कारण से पूर्ण वन आग से नष्ट होता है। वैसे ही कुपुत्र के कारण संपूर्ण परिवार नष्ट होता है।"

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नरत्वं दुर्लभं लोके  विद्या तत्र सुदुर्लभा। कवित्वं दुर्लभं तत्र  शक्तिस्तत्र सुदुर्लभा।। -अग्निपुराणम्   अर्थ : "इस लोक में प्रथम तो 'मनुष्य योनि में जन्म' ले पाना ही दुर्लभ है, उसमें भी 'विद्या' दुर्लभ है, विद्या प्राप्त होने पर भी 'कवित्व' दुर्लभ है और कवित्व वालों में भी 'शक्ति' तो एकदम दुर्लभ है।"

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उदये सविता रक्तो रक्त:श्चास्तमये तथा । सम्पतौ च विपत्तौ च महतामे करूपता ।। अर्थ : "जिस प्रकार सूर्य उदय के समय व अस्त के समय लाल रहता है। उसी प्रकार श्रेष्ठ पुरूष वैभव काल मे और संकट काल मे एक जैसे ही रहते है।"

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ईर्ष्या घृणी न संतुष्ट: क्रोधिनो नित्यशंकित: । परभाग्योपजीवी च षडेते नित्यदु:खिता: ॥ अर्थ : "ईर्ष्या करनेवाला, घृणा करनेवाला, असंतोषी, क्रोधी सदा शङ्कित रहनेवाला और दूसरें के भाग्यपर जीवन निर्वाह करनेवाला ये सदा दु:खी रहते है।"

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क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:। स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥           -श्रीमद्भगवद्गीतायाः द्वितीय अध्यायः, श्लोक ६३ अर्थ :  "क्रोध से मनुष्य की मति मारी जाती है यानी मूढ़ हो जाती है जिससे स्मृति भ्रमित हो जाती है। स्मृति-भ्रम हो जाने से मनुष्य की बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धि का नाश हो जाने पर मनुष्य खुद अपना ही का नाश कर बैठता है।"

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आयुष: क्षण एकोऽपि सर्वरत्नैर्न लभ्यते । नीयते स वृथा येन प्रमाद: सुमहानहो ॥ अर्थ : "सभी रत्नों के बदले मे आयुष्य का एक क्षण भी प्राप्त नहीं हो सकताा। ऐसे जीवन के क्षण जो निरर्थक ही खर्च कर रहे है वे कितनी बडी गलती कर रहे है।"

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आदेयस्य प्रदेयस्य कर्तव्यस्य च कर्मण: । क्षिप्रमक्रियमाणस्य काल: पिबति तद्रसम् ॥ अर्थ : "समय के अनुसार कर्म करना हमारा कर्तव्य है।समय पर नहीं किए गए कार्य का रस काल पी जाता है।"

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अश्वं नैव गजं नैव व्याघ्रं नैव च नैव च । अजापुत्रं बलिं दद्यात् देवो दुर्बलघातक:|| अर्थ : "अश्व ? नहीं, हाथी ? नहीं। शेर ? तो बिलकुल ही नहीं। बकरी को ही बली चढाया जाता है। देव भी दुर्बल को ही नष्ट करते है।"

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अयुक्तं स्वामिनो युक्तं युक्तं नीचस्य दूषणम् । अमृतं राहते मृत्युर्विषं शंकरभूषणम् ॥ अर्थ : "समर्थ मनुष्य के लिये साधारण वस्तु भी आभूषण हो जाती है, जबकि नीच के लिये सुन्दर भी दोषरूप बन जाती है ।अमृत राहू के लिये प्राणहारी बन गया जबकी प्राणहारीविष भी शिव के लिये भूषण बन गया।"

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दुर्जनेषु च सर्पेषु वरं सर्पो न दुर्जनः। सर्पो दंशति कालेन दुर्जनस्तु पदे-पदे ॥ अर्थ :   " दुष्ट और साँप, इन दोनों में साँप अच्छा है, न कि दुष्ट । साँप तो एक ही बार डसता है, किन्तु दुष्ट तो पग-पग पर डसता रहता है। "

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अद्भि: गात्राणि शुद्ध्यन्ति मन: सत्येन शुद्ध्यति। विद्या तपोभ्यां भूतात्मा बुध्दि: ज्ञानेन शुद्ध्यति॥ अर्थ : "पानी से गात्र शुद्ध होते है। सत्य से मन शुद्ध  होता है। विद्या और तप से भूतात्मा और ज्ञान से बुद्धि शुद्ध होती है।"

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विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्। पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम् ।। अर्थ :   " "विद्या" मनुष्य को 'नम्रता' देती है, और नम्रता से 'योग्यता', योग्यता से 'धन', धन से 'धर्म', फिर धर्म  से 'सुख' पाता है। " - हितोपदेशः -> नारायणपण्डितः

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जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि । प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तारे वस्तुशक्तितः॥ अर्थ :   "जल में तेल, दुष्ट से कहि गई बात, योग्य व्यक्ति को दिया गया दान तथा बुद्धिमान को दिया ज्ञान थोड़ा सा होने पर भी अपने आप विस्तार प्राप्त कर लेते हैं।"

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यथा धेनु सहस्रेषु वत्सो गच्छति मातरम्। तथा यच्च कृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति॥ अर्थ : "जैसे हजारों गायों में भी बछरा अपनी ही मां के पास जाता है,उसी तरह किया हुआ कर्म कर्ता के पीछे-पीछे जाता है।"