पांडवारा बत्ती (पांडवों की मशाल) PANDAVARA BHATTI Plant (Pandava’s torch) The leaf that lit the Pandavas’ path through the forest. वैज्ञानिक नाम: कैलिकारपा टोमेंटोसा Scientific name: Callicarpa tomentosa परिवार: वर्बेनेसी (वर्बेना परिवार) Family: Verbenaceae (Verbena family) समानार्थी ( Synonyms): Callicarpa lobata, Callicarpa villosa, Callicarpa wallichiana बेंगलुरु: पांडवारा बत्ती (पांडवों की मशाल), एक ऐसा पौधा जिसे महाभारत के पांडवों ने अपने वनवास के दौरान चिमनी की मशाल के रूप में इस्तेमाल करने के लिए रखा था, हाल ही में दक्षिण भारत में एक विश्वव्यापी वैज्ञानिक मंच के सदस्य द्वारा देखा गया था । Bengaluru: Pandavara Batti (Pandavas’ torch), a plant that’s said to possess been used as a fireplace torch by the Pandavas of Mahabharata during their Vanavasa (exile), was recently spotted by a worldwide citizen scientists’ forum member in South India. यह तथाकथित है क्योंकि आप इसकी ताज़ी हरी पत्ती के साथ भी एक मशाल जला सकते हैं - पत्ती की नोक पर लगाया जा...
3 वर्ती प्रकृति सात्विक - दैविक राजसिक - मानवीय तामसिक - दानवीय ये चैव सात्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये | मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि || गीता 7/12|| अर्थ : " जो भी सात्विक, राजसिक व तामसिक भाव हैं, उनको तू मुझसे ही होने वाले जान। वे मुझमें हैं किन्तु मैं उनमें नहीं हूँ ।" व्याख्या : सत्व, रज व तम इन तीनों गुणों से प्रकृति की रचना हुई है, इसलिए सृष्टि के सभी पदार्थों में ये तीनों गुण विद्यमान हैं। हमारे में भी ये तीनों गुण होते हैं, इन गुणों की शक्ति ही व्यक्ति से कार्य करवाती है। जब जो गुण बढ़ता है, तब मन में उस गुण का भाव आता है। सत्व गुण हल्कापन देता है, रज गुण गति और तम गुण मोह व आलस्य देता है। इन गुणों के कारण ही मन में बदलाव आता रहता है। भगवान कह रहे हैं कि, "ऐसा जानो कि सात्विक, राजसिक व तामसिक तीनों गुणों के भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं, वास्तव में ये तीनों गुण मुझमें है, लेकिन 'मैं' इन गुणों में नहीं हूँ, अर्थात इनसे अति परे हूँ।" त्रिगुण सूक्ष्म और अदृश्य हैं, स्थूल नहीं है तथा केवल सूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय अथवा छठवीं ज्ञानेंद्रिय (सू...
मनोबुद्ध्यहङ्कार चित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे । न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥१॥ મનો બુદ્ધિ અહંકાર ચિત્તાનિ નાહં ન ચ શ્રોત્ર જિવ્હે ન ચ ઘ્રાણ નેત્રે | ન ચ વ્યોમ ભૂમિ ન તેજો ન વાયુ: ચિદાનંદ રૂપઃ શિવોહમ્ શિવોહમ્ || ૧|| અર્થ : મૈં મન, બુદ્ધિ, અહંકાર ઔર સ્મૃતિ નહીં હૂઁ, ન મૈં કાન, જિહ્વા, નાક ઔર આઁખ હૂઁ, ન મૈં આકાશ, ભૂમિ, તેજ ઔર વાયુ હી હૂઁ, મૈં ચૈતન્ય રૂપ હૂઁ, આનંદ હૂઁ, શિવ હૂઁ, શિવ હૂઁ… Meaning : 1.1: Neither am I the Mind, nor the Intelligence or Ego, 1.2: Neither am I the organs of Hearing (Ears), nor that of Tasting (Tongue), Smelling (Nose) or Seeing (Eyes), 1.3: Neither am I the Sky, nor the Earth, Neither the Fire nor the Air, 1.4: I am the Ever Pure Blissful Consciousness; I am Shiva, I am Shiva, The Ever Pure Blissful Consciousness. न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः न वा सप्तधातुः न वा पञ्चकोशः । न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायु चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥२॥ ન ચ પ્રાણ સંજ્ઞો ન વૈ પઞ્ચવાયુઃ ન વા સપ્તધાતુ: ન વા પઞ્ચકોશઃ | ન વાક્પાણ...
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